Tuesday, September 8, 2015

वो एक नाम

वो एक नाम
जिस नाम के बिना
मेरा हर दिन अधूरा
मेरी हर शाम रंगहीन थी

वो एक नाम
जिस के साथ
जुड़ा था मेरा नाम
जैसे मेरी पहचान ही नहीं थी

वो एक नाम
जो खुशियों से भरा था
उम्मीद का दूसरा नाम था
उदासी ज़रा भी नहीं थी

वो एक नाम
जो एक नयी सुबह का वादा करता था
जीने की राह दिखाता था
उसमें बेबसी कहीं भी नहीं थी

आज वो नाम
कहीं नहीं है
आज वो उम्मीद
कहीं नहीं है

आज है, तो बस आँसू

और हार...

Tuesday, April 28, 2015

धरती पर भार बहुत बढ़ गया है






धरती पर भार बहुत बढ़ गया है

इंसान की मुसीबतों का भार
ज़िंदगी की कढ़वाहट का भार
सीने की जलन का भार
दिन- रात की बैचेनी का भार

धरती पर भार बहुत बढ़ गया है

छोटे से बड़े, हर ग़म का भार
हर इक आँसू, हर इक आह का भार
रोज़ खाई हुई, उस ठोकर का भार
रोज़ मिली हुई, उस ज़िल्लत का भार

धरती पर भार बहुत बढ़ गया है

आँखों में सूखे हुए आँसुओं का भार
भूखे पेट की जलन का भार
नंगे बदन की शर्म का भार                  
फुटपाथ पे ठिठुरती रातों का भार

धरती पर भार बहुत बढ़ गया है





Tuesday, June 11, 2013

शाम

शाम के खाली हाथों में
कुछ उदासी के पल हैं
जो धीमी-धीमी धधकनों से
कुछ कहना चाहते हैं


रात के सन्नाटे में
बहुत से यादें हैं
जो परच्छाईओं को झंझोड़ के
खुद से बिछड़ना चाहती हैं

सुबह के दामन में
वो किरण नहीं है
जो दिन के उजियारे का
संदेशा लाती है

दोपहर के वीरने में
कुछ बिखरे हुए पल हैं
जो तुम्हारा साथ पाने को
आज भी सिसकते हैं

Wednesday, July 6, 2011

एक सूना सा मकान

एक हारी हुई बाज़ी
एक थका सा इंसान
रोशनी से बहुत दूर
एक सूना सा मकान


एक पुराना सा मंदिर

एक भूली हुई बात
पैरों की आहट में
पायल की झंकार


एक चाँद का टुकड़ा

एक सूरज का ताप
बादलों की ठंडक में
पहली मौसम की बरसात


एक बुढ़िया की झोपड़ी

एक बिस्कुट की दुकान
सूखी पत्तियों से बनी
पेड़ पर वो मचान


एक आँगन में तुलसी

एक तुलसी पर दीया
चूल्‍हे के कोयले से
आँखों में धुआँ



एक नदी की हलचल

एक मुसाफिर की पदचाप
एक ऋतु का अंदेशा
एक चहरा गुमनाम


एक उदास सा चहरा

एक थका सा इंसान
रोशनी से बहुत दूर
वो सूना सा
मकान

Tuesday, May 10, 2011

Aaj.

आज बहुत पुरानी किताब के पन्नो से
तुम्हारा दिया हुआ वो फ़ूल मिला
कॉलेज के दिनो का दिया हुआ
वो फ़ूल आज भी
उस ज़िंदगी की याद दिलाता है
जब रोज़ सुबह जल्दी से तैयार होकर
मैं साइकल पर कॉलेज जाती थी
तुम अपने घर से पैदल आते थे
कभी तुम पहले पहुँचते थे
और कभी मैं
हम दोनो एक साथ ही
क्लास में जाते थे
जिस दिन तुम नहीं आते थे
मैं भी घर वापिस
चली जाती थी
वो दिन मुझे आज भी याद है
जब तुम दूर बॉमबे में
काम करने के लिए जा रहे थे
उस दिन
तुमने मुझे आख़िरी बार
एक फ़ूल दिया था
वो फ़ूल आज मुझे
बहुत पुरानी किताब के पन्नो में से मिला है

तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


आज तुम्हारी सालगिरह है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हें याद कर-कर के
खुद सोती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

सोने से पहले
आखरी ख़याल तुम्हारा होता है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

सुबह की पहली किरण से पहले
तुम्हारी याद मेरे सीने में उतरती है
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हारा नाम कोरे काग़ज़ पे
लिखती और पढ़ती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

तुम्हारी तस्वीर को सीने से
लगाए घूमती-फिरती हूँ
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?

 तुम्हारे ज़िक्र की प्यासी
दीदार की दीवानी
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


अब तो यह दिल भी नहीं रहा मेरा
तुम्हें आज क्या दूं तोहफे में?


वो रब से जो एक आख़िरी दुआ मिलेगी
उस में भी तुम्हारा ही नाम होगा
तुम्हें और ...आज क्या दूं तोहफे में?

Saturday, May 7, 2011

मेरे जैसा...


कहीं तो होगा वो

इस भीड़ से परे

इस वीराने से दूर



इस लंबी सड़क के कोने पर

जहाँ पर यह टूटी पगडंडी

एक दम ख़तम हो जाती है

बिजली के खंबे के नीचे खड़ा

अभी भी

दाहिने पावं के नाख़ून से

धूल में गोल चक्कर बनाता होगा



शायद अब तक उसने

खाना ना खाया होगा

समय की उसको

कोई सूझ-बूझ नहीं

मच्छर और मक्खियों से भी

वो चिढ़ता नहीं

वो बस चुप चाप

अकेला, निराश

मेरी राह देखता है

मुझसे मिलने की कोशिश

कभी नहीं छोढ़ता वो

एक यह ही उसकी बात

बहुत पसंद है मुझे


मुझसे क्यूँ मिलना चाहता है वो?

आज तक जिससे मिलने को

कोई नहीं आया

उससे वो क्यूँ मिलना चाहता है?

क्या वो भी मेरे जैसा है?

अकेला, उदास...?